Wednesday, May 4, 2016

भैरवी पूजन विधि

भैरवी पूजन विधि

मंत्र – हंहक  लं  ह सौ हं रं वं लं रं ढ ह स ख  फ्रे ऋ  हं फट
ध्यान रूप – भैरवी में ज्योतिमर्य चांदनी सी उज्जवल तीन नेत्रों वाली(तीसरे नेत्र के भैरवी के आज्ञा चक्र पर कल्पित करना चाहिए), उन्नत पयोधरों से युक्त, यौवन से भरपूर, भरे अंगों वाली यह देवी पदमासन में बैठी हुई है(भैरवी सुखासन भी मान्य है)।
इनकी चार भुजाएं है। दायें हाथ में माला(रुद्राक्ष) और वरद मुद्रा हैं(वरदान देने की मुद्रा) बायें हाथ में पुस्तक एवं अभय मुद्रा है।
विधिवत चरणों से मस्तक तक चमेली या ओड़हुल के फूलों से मंत्र पढ़ते हुए प्रोक्षण करें। हर बार फूल को मदिरा से सिक्त करें।
(यहाँ सामान्य पूजा के नियम होते है; पर उद्देश्य भैरवी में देवी भाव का (दोनों में) स्थापन होता है।)

 

घट पूजन

घट पूजन

घट पूजन     इसके पश्चात वहाँ भैरवी के सामने रखे घट का भी पूजन किया जाता है। इसमें मदिरा या मदिरा द्रव्य होता है। इसके सामने भुना मांस, भुना चना और फल होता है। तीन चषक (पात्र होते है) एक गुरु का, दूसरा साधक तीसरा साधिका का। पूजन के पश्चात सबसे पहले गुरु को मदिरा का पात्र अर्पित किया जाता है। गुरु उसे भैरवी रुपी देवी को अर्पण करता है। भैरवी उससे एक घूँट पान करती है, फिर उससे गुरु एक घूँट पान करता है, फिर साधक गुरु इसे साधक के पात्र एवं घट में डाल देता है।     साधक इसे फिर देवी को अर्पित करता है। वह एक घूँट लेती है और साधक को देती है। साधक उसे पी जाता है। यह पात्र साधक का होता है। फिर तीसरा पात्रा भरकर देवी को अर्पित किया जाता है। भैरवी घूँट भर्ती है, फिर गुरु को देती है। इस पात्र के शेष को साधक को नहीं दिया जाता । इससे देवी का पात्र जूठा हो जाता है और साधक को मना होता है। वह देवी रुपी भैरवी का जूठा खा-पी सकता है, पर उसे अपना जूठा उसे नहीं खिला सकता।     देवी पर चढ़ा प्रसाद तीनों ग्रहण करते है। पूजन की विधि सामान्य पूजन विधि होता है, जैसे देवी या घट की पूजा होती है; पर तन्त्र में मानसिक पूजा और केन्द्रीयकरण का भाव प्रमुख होता है, विधियां नहीं। साधक शुद्ध मानसिक भाव से केवल फूल प्रोक्षित करके मंत्र पाठ करके पूजन कर सकता है। घट को भी देवी माना जाता है। इसलिए इसका भी मन्त्र वहीँ होता है । यहाँ का मंत्र एक विशेष मार्ग का है। त्रिपुर  भैरवी के अन्य मन्त्र भी है।     विशेष – पूजन विधियों में अंतर भी होता है। कहीं पहले चक्र की पूजा करके भैरवी की पूजा की जाती है, तो कभी चक्र एवं घट दोनों की पूजा के बाद भैरवी पूजन होता है; पर यह सरल विधि यहाँ दी है। देवी भैरवी में प्रतिष्ठित होती है। चक्र को पीठ और घट को देवी पात्र समझ कर पूजा की जाती है।


घट पूजन


इसके पश्चात वहाँ भैरवी के सामने रखे घट का भी पूजन किया जाता है। इसमें मदिरा या मदिरा द्रव्य होता है। इसके सामने भुना मांस, भुना चना और फल होता है। तीन चषक (पात्र होते है) एक गुरु का, दूसरा साधक तीसरा साधिका का। पूजन के पश्चात सबसे पहले गुरु को मदिरा का पात्र अर्पित किया जाता है। गुरु उसे भैरवी रुपी देवी को अर्पण करता है। भैरवी उससे एक घूँट पान करती है, फिर उससे गुरु एक घूँट पान करता है, फिर साधक गुरु इसे साधक के पात्र एवं घट में डाल देता है।

साधक इसे फिर देवी को अर्पित करता है। वह एक घूँट लेती है और साधक को देती है। साधक उसे पी जाता है। यह पात्र साधक का होता है। फिर तीसरा पात्रा भरकर देवी को अर्पित किया जाता है। भैरवी घूँट भर्ती है, फिर गुरु को देती है। इस पात्र के शेष को साधक को नहीं दिया जाता । इससे देवी का पात्र जूठा हो जाता है और साधक को मना होता है। वह देवी रुपी भैरवी का जूठा खा-पी सकता है, पर उसे अपना जूठा उसे नहीं खिला सकता।

देवी पर चढ़ा प्रसाद तीनों ग्रहण करते है। पूजन की विधि सामान्य पूजन विधि होता है, जैसे देवी या घट की पूजा होती है; पर तन्त्र में मानसिक पूजा और केन्द्रीयकरण का भाव प्रमुख होता है, विधियां नहीं। साधक शुद्ध मानसिक भाव से केवल फूल प्रोक्षित करके मंत्र पाठ करके पूजन कर सकता है। घट को भी देवी माना जाता है। इसलिए इसका भी मन्त्र वहीँ होता है । यहाँ का मंत्र एक विशेष मार्ग का है। त्रिपुर  भैरवी के अन्य मन्त्र भी है।

विशेष – पूजन विधियों में अंतर भी होता है। कहीं पहले चक्र की पूजा करके भैरवी की पूजा की जाती है, तो कभी चक्र एवं घट दोनों की पूजा के बाद भैरवी पूजन होता है; पर यह सरल विधि यहाँ दी है। देवी भैरवी में प्रतिष्ठित होती है। चक्र को पीठ और घट को देवी पात्र समझ कर पूजा की जाती है।

 

भैरवी साधना की तांत्रिक सिद्धि

भैरवी साधना की तांत्रिक सिद्धि

 भैरवी साधना की तांत्रिक सिद्धि  केवल इसी स्तर पर रात्रि 9 बजे से डेढ़ बजे तक पूजित भैरवी को चक्र के मध्य बैठाकर सामान्य प्रार्थना करके मदिरा-मांस-सिन्दूर-फूल-अक्षत-बेलपत्र आदि चढ़ाकर पहले उसे फिर स्वयं उसे ग्रहण करके उसे देवी रूप ध्यान करके देखते हुए प्रतिदिन इस मंत्र का 11 माला का जाप करें।  (यहाँ एक बात जानना चाहिए। इस पूजा के बाद कई गुरु साधक की भी भैरवी द्वारा भैरव मानकर पूजा करवाते है।  दूसरी बात की वाम मार्ग के अनेक सम्प्रदाय में देवी-पूजा खा-पी कर करने के निर्देश है।)  भैरवी के सामने आसन पर बैठकर दोनों घुटनों को नग्न मिलाकर सुखासन में बैठकर, अपने-अपने घुटनों पर हाथ रखे दोनों नेत्र मिलाकर रखें। साधक पहले वाचिक, फिर मानसिक जप करें; तो 21 रात में भैरवी की  आँखों में देवी नजर आने लगती है और 108 रातों में भैरवी शक्ति साधक में समा जाती है। वह भैरवी भी देवी रूप होकर कई परा मानसिक शक्तियों की  स्वामी बन जाती है।  विशेष – यह परीक्षित प्रयोग है; पर शक्तियां कामना के अनुसार प्राप्त होती है। कामना ‘ज्ञान’ की है, तो वही शक्ति प्राप्त होगी, धन के लिए फिर सिद्धि करनी होगी, भले ही वह एक चौथाई समय में हो।


भैरवी साधना की तांत्रिक सिद्धि

केवल इसी स्तर पर रात्रि 9 बजे से डेढ़ बजे तक पूजित भैरवी को चक्र के मध्य बैठाकर सामान्य प्रार्थना करके मदिरा-मांस-सिन्दूर-फूल-अक्षत-बेलपत्र आदि चढ़ाकर पहले उसे फिर स्वयं उसे ग्रहण करके उसे देवी रूप ध्यान करके देखते हुए प्रतिदिन इस मंत्र का 11 माला का जाप करें।
(यहाँ एक बात जानना चाहिए। इस पूजा के बाद कई गुरु साधक की भी भैरवी द्वारा भैरव मानकर पूजा करवाते है।
दूसरी बात की वाम मार्ग के अनेक सम्प्रदाय में देवी-पूजा खा-पी कर करने के निर्देश है।)
भैरवी के सामने आसन पर बैठकर दोनों घुटनों को नग्न मिलाकर सुखासन में बैठकर, अपने-अपने घुटनों पर हाथ रखे दोनों नेत्र मिलाकर रखें। साधक पहले वाचिक, फिर मानसिक जप करें; तो 21 रात में भैरवी की  आँखों में देवी नजर आने लगती है और 108 रातों में भैरवी शक्ति साधक में समा जाती है। वह भैरवी भी देवी रूप होकर कई परा मानसिक शक्तियों की  स्वामी बन जाती है।
विशेष – यह परीक्षित प्रयोग है; पर शक्तियां कामना के अनुसार प्राप्त होती है। कामना ‘ज्ञान’ की है, तो वही शक्ति प्राप्त होगी, धन के लिए फिर सिद्धि करनी होगी, भले ही वह एक चौथाई समय में हो।

 

स्थान का रहस्य

स्थान का रहस्य

स्थान का रहस्य  यह ब्रह्माण्ड विशालकाय है। इसका विस्तार भी हो रहा है । स्पष्ट है कि जिसमें यह अपना विस्तार करता जा रहा है, वह ‘स्थान’ है। यदि ‘स्थान’ न हो, तो यह अपना विस्तार नहीं कर सकता। फिर यह भी प्रश्न उठता है कि जहाँ स्थान है; वहाँ कुछ न कुछ तो होगा; क्योंकि बिना किसी ‘तत्व’ के स्थान बना नहीं रह सकता। जब कुछ नहीं, तो स्थान भी नहीं होगा। इसलिए पूरी तरह स्पष्ट है कि इस स्थान में कुछ न कुछ है। इसके साथ यह भी प्रश्न उठता है कि इस स्थान का विस्तार कहाँ तक है?     बहुत सारे प्राचीन आचार्यों ने इसके सम्बन्ध में कहा है। विशेषकर उपनिषद और अनेक प्राचीन ग्रंथों में टुकड़ों में यत्र-तत्र जो कहा गया है; उससे ज्ञात होता है कि इस ‘स्थान’ का कोई प्रारंभ या अंत नहीं है। यह सर्वव्याप है। इसमें एक ऐसा नॉन फिजिकल (जो भौतिक नहीं है) तत्व फैला हुआ है, जो परम सूक्ष्म, परमविरल, परम ऊर्जा मय और सर्व चैतन्य है। इतने सारे गुण रहते हुए भी यह तत्व निर्गुण है; क्योंकि दूसरा कोई नहीं है, जिसके साथ प्रतिक्रिया करके यह अपने गुणों को प्रकट करे। इसे उपनिषदों में निर्गुण निराकार तत्व के रूप में यत्र – तत्र वर्णित किया गया है। तन्त्र ग्रंथों में इसे सदाशिव कहा गया है। अनेक अन्य विवरणों में यह भी कहा गया है कि यह तत्व अजन्मा और अविनाशी है अर्थात् यह न तो उत्पन्न होता है, न ही नष्ट होता है। यह एक ही है, इसमें कोई भेद-विभेद नहीं है।     इन विवरणों के अनुसार यह परमतत्व ही इस सृष्टि का सार तत्व है। इसमें जब तक सृष्टि की क्रिया नहीं होती, तब तक कोई गुण , आकार, क्रियात्मकता नहीं होती। जिस ब्रह्माण्ड को हम अनुभूत करते है ; वही प्रकृति है या सृष्टि है। यह प्रकृति एक सूक्ष्मतम परमाणु के रूप में प्रकट होती है और अपना विस्तार करती हुई विशालकाय ब्रह्माण्ड के रूप में अनंत रूप-गुण और क्रियाओं को व्यक्त करने लगती है। यह प्रक्रिया किसी प्रकार की उत्पत्ति नहीं है। नया कोई तत्व उत्पन्न नहीं होता। यह परम तत्व की धाराएं से बननेवाली एक जटिल संरचना है। इसमें उसके सिवा और कुछ भी नहीं है। यह ऐसा ही हैं, जैसा वायु में चक्रवात, जल में भंवर बनता है। अंतर केवल इतना है कि अपने विलक्षण (जो भौतिक नहीं) अस्तित्त्व के कारण यह अपनी धाराओं से एक जटिल संरचना बनाकर उसी में अपने गुणों को प्रकट कर रही है।     सामान्यतया देवी-देवताओं के बाद के वैज्ञानिक विवरणों में विचरण कर रहे लोगों को शायद यह समझ में न आयें; क्योंकि बहुत से लोग प्रकृति को जड़ और चेतना को परमात्मा प्रदत्त मानकर बहस करने लगते है। ऐसे लोग अपनी आस्थाओं में जीने के लिए स्वतंत्र है; जैसा कि आधुनिक विज्ञापन, जो कभी कहता है कि एक गोला फट गया, तो कभी किसी इकाई में धूल कणों के संघनित होने की कहानी कहने लगता है; पर यह प्रश्न तो बना ही रहेगा कि यह जड़ प्रकृति; जो अनंत रूपों में ढल रही है, लगातार क्रियाशील है, जिसका एक रूप भी शाश्वत नहीं है, उसके बीच वह मूल सार कौन है, जो ढल रहा है?     वह चेतन है या जड़ है ; यह तोबाद का प्रश्न है। पहला प्रश्न तो यही है कि वह गोला किस पक्षी का अंडा था? क्या वह शाश्वत था? यदि हां, तो उसमें क्रिया कैसे उत्पन्न हो गयी? धूल कण कहाँ से आ गये ?     इन प्रश्नों में उलझ कर मैंने बहुत समय तक मानसिक परिश्रम किया था, पर सिवा रहस्यों के विचित्र मायाजाल में फंसने के कोई तर्क पूर्ण आधार नहीं मिला। जहाँ तक धार्मिक आस्थाओं के देवी-देवताओं का प्रश्न है; वे सत्य है, वैज्ञानिक है; पर वे परमतत्व की धाराओं से बनने वाले इस विशेष ऊर्जा संरचना की ही शक्तियां है। इनका कोई मानवीय और स्थूल रूप नहीं है। जब हम इनकी व्याख्याओं तक पहुचेंगे और भी आश्चर्यचकित कर देने वाले सत्यों का ज्ञान होगा। हम नहीं जानते कि उस युग में जब ऊर्जा तरंगों के आधुनिक स्वरुप का ज्ञान नहीं था; इन सूक्ष्मतम तरंगों एवं संरचनाओं का ज्ञान उन लोगों को कैसे हुआ, जिनको हमारे विद्वान और प्रभावशाली लोग सपेरे, अग्निपूजक, चरवा है और टिकी रखने वाले , नंगे पांव घूमने वाले को पीनधारी गंवार से अधिक कुछ नहीं समझते। निसंदेह मैंने अपने प्रयत्नों से इस सम्पूर्ण विज्ञान को जाना है और सिएमिन आधुनिक विज्ञान की जानकारियों का एक बड़ा हाथ रहा है ; पर हमने इस विज्ञान के विवरण प्राचीनतम ग्रंथों में भी देखे है, भले ही वे अपने अपने ढंग से कहे गये है। जब मैंने उन विशाल विस्तार में फैले संस्कृत के अछूत समझकर लाइब्रेरीयों और विश्वविद्यालयों में धूल फाँक रहे इन ग्रंथों को पढ़ा है, मेरी हालत यह हो गयी कि समझ नहीं आया कि मैं रो पडू या अपने देशवासियों एवं संस्कृति के द्रोहियों की अज्ञानता पर ढहाका लगाऊं। एक अद्भुत विशालकाय विस्तृत और सूक्ष्मतम स्तर का ऊर्जा विज्ञानं , परमाणु विज्ञान, सृष्टि विज्ञान , नक्षत्र विज्ञान, जीव विज्ञान रहते हुए भी हम सारे विश्व में तकनीकी की भीख मांग रहे है।     ये सभी प्रमाणित है। आप भौतिक रूप में भी इसके प्रमाण एकत्रित कर सकते है । यदि किसी विज्ञान की व्याख्याओं के 90% प्रमाण अकाट्य रूप से प्रमाणित हो जाए, तो 10% जो आपके उपकरणों की अनुभूति सीमा के बाहर है; को भी सत्य मानने से कोई ऐतराज नहीं होना चहिये। महर्षि गौतम ने कहा था कि दो या दो से अधिक सत्य तथ्यों पर आधारित अनुमान भी सत्य ही होता है। विश्व को सर्व प्रथम कार्य-कारण नियम देने वाले न्याय दर्शन के इस प्रणेता का कहीं नाम ही नहीं है। ये दोनों यूरोपियन व्यक्तित्वों की देन समझे जाते है। जबकि इनके विवरण प्राचीन रूप में प्राप्त है। ऐसा नहीं है कि हमारे विद्वानों या सरकारों को इसका ज्ञान न हो; क्योंकि 1970 ई. से ही यह दर्शन शास्त्र के कोर्सों में पढ़ाया रहा है।     परमतत्व के इस अनंत विस्तार में सृष्टि के प्रपंच की उत्पत्ति (तन्त्र ग्रंथों में इसे प्रपंच ही कहा गया है, क्योंकि यह उत्पत्ति नहीं, एक विक्षेप है यानि स्वरुप का परिवर्तित अनुभूत होना) को बहुत से प्राचीन आचार्यों एवं ऋषि मुनियों ने इसे ‘महामाया’ कहा है। एक ऐसा मायाजाल जिसमें कुछ भी नया उत्पन्न नहीं होता; पर इसमें स्थित जीवों (इकाइयों) में अनुभूति की क्षमता में भिन्न-भिन्न शक्ति और फ्रीक्वेंसी रहने के कारण अनंत उत्पत्तियों और गुणों का प्रत्यक्ष होता है।     तन्त्र ग्रंथों में कहा गया है कि यह प्रपंच कोई आकस्मिक अनियंत्रित क्रियाओं के रूप में उत्पन्न नहीं होता। यह सब नियम बद्ध रूप से उत्पन्न होकर नियम बद्ध रूप में ही क्रिया और विकास के पथ पर सक्रिय है। सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि जिन नियमों एवं सूत्रों से , जिन क्रियाओं से, जिस संरचना में इस ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति होती है और विकास होता है; उन्ही नियमों एवं सूत्रों से इसकी प्रत्येक बड़ी या छोटी इकाइयों की उत्पत्ति, क्रिया, संरचना, विकास एवं संहार का स्वरुप होता है। यानी सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड और इसकी इकाइयों की उत्पत्ति से लेकर संहार तक , संरचना से लेकर क्रिया तक एक ही प्रकार के नियमों एवं सूत्रों से बद्ध है। इसमें कहीं कोई अपवाद नहीं है। ये नियम और सूत्र ब्रह्माण्ड के नहीं है। ये उस परमतत्व से उत्पन्न होते है। ब्रह्माण्ड और इसकी इकाईयां इससे शासित है। किसी सूक्ष्मत या विशालतम इकाई की शक्ति नहीं कि इन नियमों से बाहर चला जाए। ये नियम शाश्वत एवं अपरिवर्तनशील है। ब्रह्माण्ड हजार बार उत्पन्न हो, नियम ये ही रहेंगे।     हमारे बुद्धिवादी और विज्ञानवादी प्रमाण प्रमाण चिल्लाने लगेंगे। इनके प्रत्यक्ष प्रमाण है। परन्तु पहले यह जानना जरूरी है कि वे नियम क्या है और यह सृष्टि कैसे उत्पन्न होती है और इसका विकास किस प्रकार होता है?

स्थान का रहस्य

यह ब्रह्माण्ड विशालकाय है। इसका विस्तार भी हो रहा है । स्पष्ट है कि जिसमें यह अपना विस्तार करता जा रहा है, वह ‘स्थान’ है। यदि ‘स्थान’ न हो, तो यह अपना विस्तार नहीं कर सकता। फिर यह भी प्रश्न उठता है कि जहाँ स्थान है; वहाँ कुछ न कुछ तो होगा; क्योंकि बिना किसी ‘तत्व’ के स्थान बना नहीं रह सकता। जब कुछ नहीं, तो स्थान भी नहीं होगा। इसलिए पूरी तरह स्पष्ट है कि इस स्थान में कुछ न कुछ है। इसके साथ यह भी प्रश्न उठता है कि इस स्थान का विस्तार कहाँ तक है?

बहुत सारे प्राचीन आचार्यों ने इसके सम्बन्ध में कहा है। विशेषकर उपनिषद और अनेक प्राचीन ग्रंथों में टुकड़ों में यत्र-तत्र जो कहा गया है; उससे ज्ञात होता है कि इस ‘स्थान’ का कोई प्रारंभ या अंत नहीं है। यह सर्वव्याप है। इसमें एक ऐसा नॉन फिजिकल (जो भौतिक नहीं है) तत्व फैला हुआ है, जो परम सूक्ष्म, परमविरल, परम ऊर्जा मय और सर्व चैतन्य है। इतने सारे गुण रहते हुए भी यह तत्व निर्गुण है; क्योंकि दूसरा कोई नहीं है, जिसके साथ प्रतिक्रिया करके यह अपने गुणों को प्रकट करे। इसे उपनिषदों में निर्गुण निराकार तत्व के रूप में यत्र – तत्र वर्णित किया गया है। तन्त्र ग्रंथों में इसे सदाशिव कहा गया है। अनेक अन्य विवरणों में यह भी कहा गया है कि यह तत्व अजन्मा और अविनाशी है अर्थात् यह न तो उत्पन्न होता है, न ही नष्ट होता है। यह एक ही है, इसमें कोई भेद-विभेद नहीं है।

इन विवरणों के अनुसार यह परमतत्व ही इस सृष्टि का सार तत्व है। इसमें जब तक सृष्टि की क्रिया नहीं होती, तब तक कोई गुण , आकार, क्रियात्मकता नहीं होती। जिस ब्रह्माण्ड को हम अनुभूत करते है ; वही प्रकृति है या सृष्टि है। यह प्रकृति एक सूक्ष्मतम परमाणु के रूप में प्रकट होती है और अपना विस्तार करती हुई विशालकाय ब्रह्माण्ड के रूप में अनंत रूप-गुण और क्रियाओं को व्यक्त करने लगती है। यह प्रक्रिया किसी प्रकार की उत्पत्ति नहीं है। नया कोई तत्व उत्पन्न नहीं होता। यह परम तत्व की धाराएं से बननेवाली एक जटिल संरचना है। इसमें उसके सिवा और कुछ भी नहीं है। यह ऐसा ही हैं, जैसा वायु में चक्रवात, जल में भंवर बनता है। अंतर केवल इतना है कि अपने विलक्षण (जो भौतिक नहीं) अस्तित्त्व के कारण यह अपनी धाराओं से एक जटिल संरचना बनाकर उसी में अपने गुणों को प्रकट कर रही है।

सामान्यतया देवी-देवताओं के बाद के वैज्ञानिक विवरणों में विचरण कर रहे लोगों को शायद यह समझ में न आयें; क्योंकि बहुत से लोग प्रकृति को जड़ और चेतना को परमात्मा प्रदत्त मानकर बहस करने लगते है। ऐसे लोग अपनी आस्थाओं में जीने के लिए स्वतंत्र है; जैसा कि आधुनिक विज्ञापन, जो कभी कहता है कि एक गोला फट गया, तो कभी किसी इकाई में धूल कणों के संघनित होने की कहानी कहने लगता है; पर यह प्रश्न तो बना ही रहेगा कि यह जड़ प्रकृति; जो अनंत रूपों में ढल रही है, लगातार क्रियाशील है, जिसका एक रूप भी शाश्वत नहीं है, उसके बीच वह मूल सार कौन है, जो ढल रहा है?

वह चेतन है या जड़ है ; यह तोबाद का प्रश्न है। पहला प्रश्न तो यही है कि वह गोला किस पक्षी का अंडा था? क्या वह शाश्वत था? यदि हां, तो उसमें क्रिया कैसे उत्पन्न हो गयी? धूल कण कहाँ से आ गये ?

इन प्रश्नों में उलझ कर मैंने बहुत समय तक मानसिक परिश्रम किया था, पर सिवा रहस्यों के विचित्र मायाजाल में फंसने के कोई तर्क पूर्ण आधार नहीं मिला। जहाँ तक धार्मिक आस्थाओं के देवी-देवताओं का प्रश्न है; वे सत्य है, वैज्ञानिक है; पर वे परमतत्व की धाराओं से बनने वाले इस विशेष ऊर्जा संरचना की ही शक्तियां है। इनका कोई मानवीय और स्थूल रूप नहीं है। जब हम इनकी व्याख्याओं तक पहुचेंगे और भी आश्चर्यचकित कर देने वाले सत्यों का ज्ञान होगा। हम नहीं जानते कि उस युग में जब ऊर्जा तरंगों के आधुनिक स्वरुप का ज्ञान नहीं था; इन सूक्ष्मतम तरंगों एवं संरचनाओं का ज्ञान उन लोगों को कैसे हुआ, जिनको हमारे विद्वान और प्रभावशाली लोग सपेरे, अग्निपूजक, चरवा है और टिकी रखने वाले , नंगे पांव घूमने वाले को पीनधारी गंवार से अधिक कुछ नहीं समझते। निसंदेह मैंने अपने प्रयत्नों से इस सम्पूर्ण विज्ञान को जाना है और सिएमिन आधुनिक विज्ञान की जानकारियों का एक बड़ा हाथ रहा है ; पर हमने इस विज्ञान के विवरण प्राचीनतम ग्रंथों में भी देखे है, भले ही वे अपने अपने ढंग से कहे गये है। जब मैंने उन विशाल विस्तार में फैले संस्कृत के अछूत समझकर लाइब्रेरीयों और विश्वविद्यालयों में धूल फाँक रहे इन ग्रंथों को पढ़ा है, मेरी हालत यह हो गयी कि समझ नहीं आया कि मैं रो पडू या अपने देशवासियों एवं संस्कृति के द्रोहियों की अज्ञानता पर ढहाका लगाऊं। एक अद्भुत विशालकाय विस्तृत और सूक्ष्मतम स्तर का ऊर्जा विज्ञानं , परमाणु विज्ञान, सृष्टि विज्ञान , नक्षत्र विज्ञान, जीव विज्ञान रहते हुए भी हम सारे विश्व में तकनीकी की भीख मांग रहे है।

ये सभी प्रमाणित है। आप भौतिक रूप में भी इसके प्रमाण एकत्रित कर सकते है । यदि किसी विज्ञान की व्याख्याओं के 90% प्रमाण अकाट्य रूप से प्रमाणित हो जाए, तो 10% जो आपके उपकरणों की अनुभूति सीमा के बाहर है; को भी सत्य मानने से कोई ऐतराज नहीं होना चहिये। महर्षि गौतम ने कहा था कि दो या दो से अधिक सत्य तथ्यों पर आधारित अनुमान भी सत्य ही होता है। विश्व को सर्व प्रथम कार्य-कारण नियम देने वाले न्याय दर्शन के इस प्रणेता का कहीं नाम ही नहीं है। ये दोनों यूरोपियन व्यक्तित्वों की देन समझे जाते है। जबकि इनके विवरण प्राचीन रूप में प्राप्त है। ऐसा नहीं है कि हमारे विद्वानों या सरकारों को इसका ज्ञान न हो; क्योंकि 1970 ई. से ही यह दर्शन शास्त्र के कोर्सों में पढ़ाया रहा है।

परमतत्व के इस अनंत विस्तार में सृष्टि के प्रपंच की उत्पत्ति (तन्त्र ग्रंथों में इसे प्रपंच ही कहा गया है, क्योंकि यह उत्पत्ति नहीं, एक विक्षेप है यानि स्वरुप का परिवर्तित अनुभूत होना) को बहुत से प्राचीन आचार्यों एवं ऋषि मुनियों ने इसे ‘महामाया’ कहा है। एक ऐसा मायाजाल जिसमें कुछ भी नया उत्पन्न नहीं होता; पर इसमें स्थित जीवों (इकाइयों) में अनुभूति की क्षमता में भिन्न-भिन्न शक्ति और फ्रीक्वेंसी रहने के कारण अनंत उत्पत्तियों और गुणों का प्रत्यक्ष होता है।

तन्त्र ग्रंथों में कहा गया है कि यह प्रपंच कोई आकस्मिक अनियंत्रित क्रियाओं के रूप में उत्पन्न नहीं होता। यह सब नियम बद्ध रूप से उत्पन्न होकर नियम बद्ध रूप में ही क्रिया और विकास के पथ पर सक्रिय है। सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि जिन नियमों एवं सूत्रों से , जिन क्रियाओं से, जिस संरचना में इस ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति होती है और विकास होता है; उन्ही नियमों एवं सूत्रों से इसकी प्रत्येक बड़ी या छोटी इकाइयों की उत्पत्ति, क्रिया, संरचना, विकास एवं संहार का स्वरुप होता है। यानी सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड और इसकी इकाइयों की उत्पत्ति से लेकर संहार तक , संरचना से लेकर क्रिया तक एक ही प्रकार के नियमों एवं सूत्रों से बद्ध है। इसमें कहीं कोई अपवाद नहीं है। ये नियम और सूत्र ब्रह्माण्ड के नहीं है। ये उस परमतत्व से उत्पन्न होते है। ब्रह्माण्ड और इसकी इकाईयां इससे शासित है। किसी सूक्ष्मत या विशालतम इकाई की शक्ति नहीं कि इन नियमों से बाहर चला जाए। ये नियम शाश्वत एवं अपरिवर्तनशील है। ब्रह्माण्ड हजार बार उत्पन्न हो, नियम ये ही रहेंगे।

हमारे बुद्धिवादी और विज्ञानवादी प्रमाण प्रमाण चिल्लाने लगेंगे। इनके प्रत्यक्ष प्रमाण है। परन्तु पहले यह जानना जरूरी है कि वे नियम क्या है और यह सृष्टि कैसे उत्पन्न होती है और इसका विकास किस प्रकार होता है?

 

Tuesday, May 3, 2016

तन्त्र विद्या का वैज्ञानिक रहस्य

तन्त्र विद्या का वैज्ञानिक रहस्य

तन्त्र विद्या का वैज्ञानिक रहस्य 

तन्त्र विद्या का वैज्ञानिक रहस्य

 

जिस विषय को आप तक पहुँचाने के लिए धर्मालय की स्थापना की गयी थी, उसे उसे वास्तविक तौर पर बताने के लिए मैं आज से प्रयत्न कर रहा हूँ । इतने दिनों तक मैं ऐसे लोगों को जोड़ने का प्रयत्न करता रहा, जो वास्तव में जानना चाहते है । जिनके मन में जिज्ञासा है कि धर्म की जिन मान्यताओं को हम मानते है, उनके पीछे कोई सत्य भी है या ये नितांत अंधी आस्थाएं है; जैसा कि विश्व के बुद्धिजीवी कहते है । जो ये जानना चाहते है कि मन्दिर में घंटा बजाने और गुरुद्वारे में मत्थे टेकने से क्यों लाभ होता और क्यों नहीं होता है, तो क्यों नहीं होता है । सनातन धर्म का स्वरुप आज विचित्र हो गया है । लोग धर्म को पूजा-पाठ-चन्दन-तिलक-भभूत-जटाओं की तराजू में तौल रहे है । किसी को कोई विशेष सिद्धि चाहिए, कोई इस विश्वास में है कि आकाश में कोई देवी रहती है , कोई यह मानता है कि नहीं , वे देवी नहीं देवता है, कोई विष्णुपुराण का भक्त है, तो कोई शिव पुराण का । ऐसा कोई भी व्यक्ति इस विज्ञान को समझना नहीं चाहेगा । इसलिए नहीं चाहेगा कि उसके गुरु ने तो नाक की सीध में चलने के लिए कहा था, सामने पेड़ आ गया तो उसपर चढ़ जाते? बायें-दायें घूमें क्यों? शास्त्रों के अर्थ लगाने के संबध में दयानन्द सरस्वती का एक कथन याद आ जाता है कि भोजन करते समय ‘सैन्धव’ मांगने पर जो घोडा ले आये , ऐसा विद्वान् किस काम का? एक दूसरी समस्या भी सामने आ जाती है ।

जब भी कभी हम धर्म के सत्य का ज्ञान करना चाहेंगे, हमें इससे सम्बन्धित सभी चीजों का अध्ययन करना होगा । किसी के गुरु , एक श्लोक, एक शास्त्र, एक सम्प्रदाय ने नाम पर इसके सत्य को जाना नहीं जा सकता ।सत्य को जानने के लिए अच्छे – बुरे सबको छानना होगा ।आप किसी विषय को अछूत मानकर सत्य का ज्ञान नहीं कर सकते । प्रत्येक विषय , प्रत्येक क्षेत्र के कई रंग होते है । जब तक सबको न जाना जाए, उस विषय को समझना मुश्किल है ।

मैं न तो तांत्रिक था, न ही आध्यात्मिकभगवान् के मन्दिर में सिर जरूर नवाता था, देवी-देवताओं पर श्रद्धा भी थी; परन्तु यह सभी सांस्कारिक था । मैं धार्मिक नहीं था, परम्परागत नियमों के प्रति भी लापरवाह था । मेरे मन में बचपन से केवल एक ही जिज्ञासा था कि यह क्या है? क्या है यह अजूबा? जिसके के नन्हे से गोले पर हमारी दुनिया बसी हुई है । यह क्या है? क्यों है? यह जानने की स्वाभाविक इच्छा थी ।मैं आधुनिक शिक्षित था, इसलिए विज्ञान में ही इसका हल ढूँढने लगा ।यह एक पागलपन था ।मुझे खुद विश्वास नहीं था कि इसमें कोई सफलता मिलेगी ।

वह 1975-85 का समयकाल था । मैं लाखों बिकने वाली पत्रिकाओं का सम्पादक था । अधिक समय नहीं मिलता था । उस समय सूचना के माध्यम भी अत्यंत सिमित थे । गनीमत केवल यह थी कि शिक्षा के क्षेत्र में अच्छे लोग थे । उन्होंने अपने स्तर पर जानकारियों में मेरीसहायता की । इससे एक ही निष्कर्ष निकला कि वह कोई ऊर्जा है, जो पदार्थों में ढल रही है । प्रत्येक इलेक्ट्रान-प्रोटोन टूटकर उसी में परिवर्तित होता है ।

यही एक आकस्मिक रूप में मुझे गीता को पढ़ा । कार्य प्रोफेशनल था; मैं अन्धास्थावादी नहीं था । मेरा दृष्टिकोण एक निष्पक्ष पत्रकार का ही था । जितना गीता पर भाष्य लिखने वाले बता रहे थे, वह सब उसका पॉइंट तो पॉइंट अर्थ नहीं था और जो शाब्दिक अर्थ वाली पुस्तकें थी; उनमें इतने पारिभाषिक शब्दों की भरमार थी कि जब तक उनके अर्थ ज्ञात न हो, कोई समझ में आने वाला अर्थ बनता ही नहीं था । पर मुझे इतना ज्ञात हो गया था कि जो मैं जानना चाहता था, या उसी के बारे में कुछ कहा जा रहा है । क्या? यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं था ।

इसके बाद मैं आध्यात्मिक क्षेत्र की ओर मुड़ा । कुछ दिन जंगलों-पहाड़ों पर भी भटका, साधना स्थलों के रूप में प्रसिद्ध स्थलों पर गुप्त और विद्वान् साधकों की तलाश करता रहा । बाजारू तांत्रिकों से भी टकराया और प्राचीन गुप्त संस्कृत ग्रंथों की तलाश करता रहा । परन्तु सूर्य बादलों के पीछे था । जो वहां कहा गया था, उसका तात्पर्य क्या है, जानने के लिए अथक परिश्रम करना पड़ रहा था । मैं शून्य समाधि का भी अभ्यास कर रहा था और तब जो हुआ; उसको में आजतक नहीं समझ पाया । कुछ दिव्य व्यक्तित्व आये और उन्होंने मेरे मस्तिष्क में उठने वाले सारे प्रश्नों का उत्तर देना शुरू किया । जो मैंने जाना , जो कुछ मैं बताने जा रहा हूँ; वह इतना विस्मयकारी है कि हतप्रद कर देता है । और मैंने केवल जानना चाहा था; बताने वाला कोई और है । प्राप्ति के इस स्रोत पर आपको विश्वास नहीं होगा, पर जो कुछ ज्ञात हुआ है , उसे जानना मानव मात्र के लिए कल्याणकारी है ।

मैं आपको कोई फैंटम कहानी सुनाने नहीं जा रहा । मैं आपको इस प्रकृति के उस विज्ञान के बारे में बताने जा रहा हूँ, जो समय, काल, युग , से परे है । जो इस ब्रह्माण्ड का विज्ञान है । इसकी उत्पत्ति सेलेकर क्रियात्मकता से संहार तक की स्थिति को बताने वाला यह विज्ञान कहाँ से आया, किसने सबसे पहले इसे बताया या यह एक क्रमिक विकास का प्रतिफल है; मैं कह नहीं सकता; पर प्राचीन काल में भी हमारे विद्वान पूर्वज किसी न किसी रूप में इसे व्यक्त करते रहे है । हमारा कर्तव्य बनता है कि हम इस विज्ञान के वैज्ञानिक स्वरुप को जाने और जानकर इससे लाभ उठाये । क्योंकि हमारे भौतिक जीवन से लेकर धार्मिक कृत्यों और दैनिक क्रियाओं से लेकर आधुनिक वैज्ञानिक आविष्कारों के पीछे इसी विगयान के नियम और सूत्र कम कर रहे है । जो इसके अनुरूप नहीं है, वह इस प्रकृति में होता ही नहीं है । वह संहार की क्रिया है यानी उस क्रिया या स्वरुप का नाश ।

हो सकता है कि यह आपको बडबोलापन लगता हो; पर सत्य यही है । इसीलिए भारत को जगतगुरु कहा जाता रहा है । हम आज तकनीकी के लिए भटक रही है; तो यह हमारी अज्ञानता है । हमारे पूर्वजों ने तो हर एक बात सूक्ष्मतम विस्तार से बताई है ।यह टुकड़ों में है, अधूरे है; एकांगी भी है, इसमें सम्प्रदायवाद भी है; पर यह सब एक ही विज्ञान पर आधारित है । उस विज्ञान का, जो यह बताता है कि एक ग्लास पानी पीने के लिए आपको अंदर ऊर्जा स्तर पर कैसे क्रियाएं सम्पन्न होती है ।

जैसा कि आज के बौद्धिकवाद को आदत है, वह प्रमाण की बात करेगा; पर प्रमाण तो प्रमाण ढूँढने की इच्छा के बाद ही प्राप्त होता है । मस्तिष्क की प्राप्त जानकारियाँ को सत्य मानकर लिया गया निष्कर्ष जानने के सारे मार्ग पहले ही बंद कर देता है । इस विज्ञान के सभी प्रमाण प्रत्यक्ष है । केवल इसे न जानने के कारण उस दृष्टिकोण से परिक्षण न होने से वे सार्वजनिक रूप से प्रकट नहीं है ।

इस विज्ञान में तन्त्र-विद्या का स्थान
‘तन्त्र’ के नाम पर आज अनेक प्रकार की मिथ्या धारणाएं फैली हुई है । सामान्यता लोग अभिचार कर्मों को तन्त्र समझ रहे है और इसके नाम पर यह भयभीत हो जाते है या नाक भौं सिकोड़ने लगते है । पर यह भारी भ्रम है । ‘तन्त्र’ के प्राचीनतम आचार्यों के ग्रंथों को पढ़े बिना यह ज्ञात नहीं हो सकता कि यह क्या है? ‘तन्त्र’ का वास्तविक अर्थ “सिस्टम” है । यह एक सिस्टम का शास्त्र है ।

प्रश्न उठता है कि कौन सा सिस्टम?
इसका उत्तर इस प्रकार है —
वह सिस्टम , जो एक नॉन फिजिकल वीरल सूक्ष्म तेजोमय तत्व में उत्पन्न होता है; जो शाश्वत है, सर्वत्र फैला हुआ है , यह न तो उत्पन्न होता है , न इसका नाश होता है । स्थान का अस्तित्व इसके कारण है और स्थान का विस्तार असीमित है । इस अनंत विस्तार वाले इस नॉन फिजिकल एलिमेंट से ही इस ब्रह्माण्ड के पॉवर सिस्टम की उत्पत्ति होती है । यह एक ऊर्जा संरचना के क्रम से उत्पन्न होकर विकसित होने का सिस्टम है । यह सारे ब्रह्माण्ड के रहस्यों को प्रारंभ से लेकर अंत तक बताता है ।

वस्तुतः भारतीय आध्यात्म का दो रूप है । एक गृहस्थों एवं समाज के लिए सामान्य क्रिया कर्म, पूजा-पाठ , उपदेश, सत्संग के रूप में । दूसरा वैज्ञानिक रूप में, जिसे तंत्र कहा जाता है । वैदिक और शैवमार्ग के भेद से यह ‘ब्रह विद्या’ और ‘तन्त्र विद्या’ है । यह हमें बताता है कि इस ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति किसमें , क्यों, और किस प्रकार होती है । इसके अस्तित्व से लेकर क्रिया और संहार तक की व्यवस्था किस प्रकार एक के बाद एक उत्पन्न होती है । इससे ही यह ब्रह्माण्ड अनंत रूपों, अनंत स्तरों, अनंत गुणों, में व्यक्त हो रहा है । यह क्या है, क्यों है , कैसे है और किस प्रकार विकसित होता है; हम इसमें क्या है और क्यों है – यह यह भी बताता है ।

सार्वाधिक महत्वपूर्ण यह विज्ञान ही है । चमत्कारिक सिद्धि साधनाएं नहीं । मानवता का कल्याण इस विज्ञानं को जानने से हो सकता है , विधि-विधान और वर्जनाओं से भरी प्रायोगिक क्रियाओं द्वारा नहीं । हजारों वर्ष पहले की दुनिया में भटकना उचित नहीं है । आज की दुनिया ऊर्जा-जगत से जुड़ गयी है । इस विज्ञान का उपयोग आधुनिक रूप में किया जा सकता है । पर सब कुछ संध आस्था के गर्भ में डूबा है । एक का मानना है कि यह सब अंधी आस्था है, एक का मानना है , नहीं जी सब कुछ शिव जी ने किया है, यह विष्णु जी तो पुराणों से थोपे गये है ।

यदि इस सम्प्रदाय वादी सोच से हटकर हम दोनों से सम्बन्धित शास्त्रों , कथनों आदि को पढ़कर या जानकर समझने का प्रयत्न करें; तो हमें ज्ञात हो जाएगा कि सब एक ही विज्ञान को कहने का प्रयत्न कर रहे अहि; केवल कहने और प्राप्त करने की विधियों –मान्यताओं में अन्तर है ।

शास्त्र की सभी बातें प्रमाण ही हो यह आवश्यक नहीं है । ये सारे लुप्त प्राय थे । इन्हें ढूंढा और सम्पादित किया गया है । बहुत से अंश प्राप्त ही नहीं है । इन कथनों को परखने की कसौटी भी यही विज्ञान है । जो इसके विपरीत है, वह कृत्रिम है और भौतिक कारणों से बनाया गया है या जोड़ा गया है । भारत में कभी स्त्रियों को आध्यात्मिक क्षेत्र से वर्जित अन्हीं किया गया; पर ऐसे भी श्लोक सामने आ जाते है । इनके सत्यासत्य को सम्पूर्ण आचारण से समझिये । क्या यह व्यवहार या मानसिकता कहीं थी? तुरंत ज्ञात होगा कि यह पैबंद है । मूलचादर इसी रंग का नहीं अहि ।

ब्रह्माण्ड के गुप्त वैज्ञानिक रहस्य
इससे पहले कि मैं इस अचम्भित कर दने वाले विषय पर प्रकाश डालने का प्रयत्न करूँ; इसके सम्बन्ध में थोडा सामान्य रूप से जानना समीचीन होगा ।यह विषय इस प्रकार है –

उस विषय का सार कुछ प्रश्नों का उत्तर तलाशना है । ये प्रश्न वे ही हैं, जो मेरे मन में बचपन से उत्पन्न हुए थे । यह विस्तृत अजूबा यह ब्रह्माण्ड क्या है? इसके एक छोटे से कण पर हमारी दुनिया बसी हुई है और समस्त दुनिया के झमेले इसमें ही व्याप्त है । आखिर हम क्या है , कौन है , कहाँ से आते हैं? कहाँ चले जाते है ।

ये सभी आधुनिक वैज्ञानिकों के लिए भी जिज्ञासा का विषय है । उनकी खोज निरंतर चल रही है और उन्होंने बहुँत सारी बातें खोजी भी हैं । यह दूसरी बात है कि उन प्राप्त तथ्यों के आधार पर निकाले गये उनके निष्कर्षों में अनुमान अधिक है ।

आपको आश्चर्य होगा भारत में जाने किस युग से इन प्रश्नों के उत्तर तलाशे जा रहे अहि और यहाँ के ऋषियों आचार्यों ने इस पर बहुत कुछ कहा भी है । यद्यपि समयकाल के कारणों से ये टुकड़ो में है, अधूरे है और इनमें प्रायोगिक क्षेत्र ही अधिक रह गये है । संभवतः इस कारण कि इनका उपयोग सामान्य जीवन और मानव मन की लालसाओं में अधिक था । विज्ञानं के क्षेत्र अधूरे, खंडित, और सम्प्रदाय भेद से भिन्न-भिन्न रूप में कहे गये है । इनको समझने में कठिनाई होती है और न समझने पर लोग अंधी आस्थाओं के शिकार हो जाते है ।

क्या है यह विज्ञान

जब भी हम इस ब्रह्माण्ड को जहाँ तक प्रत्यक्ष करते है या इसके बारे में जो कुछ जानते है; उसपर विचार करें ; तो यह प्रश्न सामने आता है कि यह किसमें व्याप्त है? विज्ञान का आधुनिक रूप कहता है कि यह फ़ैल रहा है ; पर किसमें?

इसका स्वाभाविक उत्तर आता है कि ‘स्थान’ में । और यहीं यह प्रश्न उठता है कि यह स्थान क्या है?यदि स्थान का अस्तित्त्व है, तो उसमें जरूर कुछ न कुछ होगा, क्योंकि जहाँ कुछ नहीं ; वहां ‘स्थान’ का भी अस्तित्त्व नहीं रह सकता । यहीं से इस विज्ञान की शुरुआत होती है ।